श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.1.38 
सदा स्वरूप-सम्प्राप्तः सर्व-ज्ञो नित्य-नूतनः ।
सच्-चिद्-आनन्द-सान्द्राङ्गः सर्व-सिद्धि-निषेवितः ॥२.१.३८॥
 
 
अनुवाद
"वे सदैव अपने शाश्वत स्वरूप में स्थित रहते हैं, वे सर्वज्ञ हैं, वे सदैव युवा रहते हैं, उनका शरीर सघन शाश्वतता से बना है, तथा वे सभी सिद्धियों से युक्त हैं।"
 
"He is always situated in His eternal form, He is omniscient, He is eternally young, His body is made of condensed eternity, and He is endowed with all perfections."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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