श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 360
 
 
श्लोक  2.1.360 
यथा —
काञ्ची चित्रा मुकुटम् अतुलं कुण्डले हारि-हीरे
हारस् तारो वलयम् अमलं चन्द्रा-चारुश् चतुष्की ।
रम्या चोर्मिर् मधुरिम-पूरे नूपुरे चेत्य् अघारेर्
अङ्गैर् एवाभरण-पटली भूषिता दोग्धि भूषाम् ॥२.१.३६०॥
 
 
अनुवाद
"रंगीन करधनी, अतुलनीय मुकुट, आकर्षक हीरों के कुंडल, मोतियों का हार, बेदाग कंगन, मोतियों से जड़ा ब्रोच, मनोहर अंगूठियां और माधुर्य से भरे पायल - ये प्रचुर आभूषण आभूषण की स्थिति प्राप्त करते हैं क्योंकि वे कृष्ण के अंगों की सुंदरता से सुशोभित होते हैं।"
 
"The colourful girdle, the incomparable crown, the dazzling diamond earrings, the pearl necklace, the immaculate bracelets, the pearl-studded brooch, the lovely rings and the sweet anklets – these abundant ornaments attain the status of jewellery because they adorn the beauty of Krishna's limbs."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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