श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 351
 
 
श्लोक  2.1.351 
यथा —
स्मेरास्यः परिहित-पाटलाम्बर-श्रीश्
छन्नाङ्गः पुरट-रुचोरु-कञ्चकेन ।
उष्णीषं दधद् अरुणं धटीं च चित्राम्
कंसारिर् वहति महोत्सवे मुदं नः ॥२.१.३५१॥
 
 
अनुवाद
"कंस का शत्रु, बड़े आनन्द से मुस्कुराता हुआ, गुलाबी धोती, नारंगी पगड़ी, चमकदार सोने की उत्तम बनियान और बहुरंगी पटका पहने हुए, हममें आनन्द उत्पन्न करता है।"
 
"The enemy of Kansa, smiling with great joy, wearing a pink dhoti, orange turban, a fine vest of shining gold and a multi-coloured sash, inspires joy in us."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd