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श्लोक 2.1.339  |
यथा —
कृष्णस्य मण्डन-ततिर् मणि-कुण्डलाद्या
नीताङ्ग-सङ्गतिम् अलङ्कृतये वराङ्गि ।
शक्ता बभूव न मनाग् अपि तद्-विधाने
सा प्रत्युत स्वयम् अनल्पम् अलङ्कृतासीत् ॥२.१.३३९॥ |
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| अनुवाद |
| "हे सुन्दरी! उनके शरीर से सटे रत्नजटित कुण्डल और अन्य आभूषण उनकी सुन्दरता को बढ़ाने वाले आभूषणों का काम नहीं कर सकते। बल्कि, वे आभूषण उनके शरीर से सुशोभित हो जाते हैं और इस प्रकार उनकी सुन्दरता बढ़ जाती है।" |
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| "O beautiful one! The jeweled earrings and other ornaments that are attached to His body cannot serve as ornaments that enhance His beauty. Rather, those ornaments adorn His body and thus enhance His beauty." |
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