श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 337
 
 
श्लोक  2.1.337 
यथा —
मुखं ते दीर्घाक्षं मरकत-तटी-पीवरम् उरो
भुज-द्वन्द्वं स्तम्भ-द्युति-सुवलितं पार्श्व-युगलम् ।
परिक्षीणो मध्यः प्रथिम-लहरी-हारि जघनं
न कस्याः कंसारे हरति हृदयं पङ्कज-दृशः ॥२.१.३३७॥
 
 
अनुवाद
हे कृष्ण! आपके लम्बे नेत्रों वाला मुख, पन्ना-सी चौड़ी छाती, स्तम्भों के समान आपकी दोनों भुजाएँ, सुन्दर पार्श्व, पतली कमर और मधुरता की निरन्तर बढ़ती हुई तरंगों से शोभायमान कूल्हे - इन विशेषताओं से कमल-नेत्र वाली गोपियों का कौन-सा हृदय मोहित नहीं होगा?
 
O Krishna, your long-eyed face, your broad chest like an emerald, your arms like pillars, your beautiful sides, your slender waist and your hips graced with ever-increasing waves of sweetness—which heart of the lotus-eyed gopis would not be captivated by these features?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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