श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 331
 
 
श्लोक  2.1.331 
अत्र गोकुल-देवीनां भाव-सर्वस्व-शालिता ।
अभूत-पूर्व-कन्दर्प-तन्त्र-लीलोत्सवादयः ॥२.१.३३१॥
 
 
अनुवाद
"युवावस्था का अंत वैवाहिक प्रेम की अद्भुत लीलाओं से उत्पन्न आनंद की अभिव्यक्ति से होता है, जो पहले कभी नहीं हुई, जिसमें व्रज की कन्याएं प्रेम के सम्पूर्ण रस से भर जाती हैं।"
 
"Youth ends with the expression of joy arising from the wonderful pastimes of marital love, as never before, in which the girls of Vraja are filled with the full essence of love."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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