श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 323
 
 
श्लोक  2.1.323 
यथा —
अनङ्ग-नय-चातुरी-परिचयोत्तरङ्गे दृशौ
मुखाम्बुजम् उदञ्चित-स्मित-विलास-रम्याधरम् ।
अचञ्चल-कुलाङ्गना-व्रत-विडम्बि-सङ्गीतकं
हरेस् तरुणिमाङ्कुरे स्फुरति माधुरी काप्य् अभूत् ॥२.१.३२३॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "हरि के यौवन के उदय होते ही कैसी मधुरता प्रकट हुई! उनकी दो चंचल आँखों ने कामदेव के धूर्त आचरण से मित्रता कर ली। उनका मुखकमल अत्यंत दीप्तिमान हो गया और उनके आकर्षक होंठ मुस्कान से सुशोभित हो गए। उनके गायन से पतिव्रता स्त्रियाँ भी अपने वैवाहिक व्रत तोड़ देती थीं।"
 
Example: "What sweetness appeared in Hari's youthful appearance! His two playful eyes befriended the cunning demeanor of Cupid. His lotus face became extremely radiant, and his charming lips were adorned with a smile. Even faithful women would break their marital vows at the mere sight of his singing."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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