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श्लोक 2.1.314  |
तथा —
हरति शितिमा को’प्य् अङ्गानां महेन्द्र-मणि-श्रियं
प्रविशति दृशोर् अन्ते कान्तिर् मनाग् इव लोहिनी ।
सखि तनु-रुहां राजिः सूक्ष्मा दरास्य विरोहते
स्फुरति सुषमा नव्येदानीं तनौ वन-मालिनः ॥२.१.३१४॥ |
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| अनुवाद |
| उदाहरण: "हे मेरे मित्र! अब कृष्ण के शरीर ने एक नया सौंदर्य धारण कर लिया है। उनके सभी अंग गहरे नीले नीलमणि की आभा चुरा रहे हैं। उनकी आँखों के कोनों में लालिमा छा गई है और उनके शरीर पर कुछ बहुत ही महीन बाल उग आए हैं।" |
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| Example: "O my friend! Now Krishna's body has acquired a new beauty. All his limbs are glowing like deep blue sapphires. The corners of his eyes have turned red and some very fine hairs have grown on his body." |
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