श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.1.30 
जीवेषु एते वसन्तो’पि बिन्दु-बिन्दुतया क्वचित् ।
परिपूर्णतया भान्ति तत्रैव पुरुषोत्तमे ॥२.१.३०॥
 
 
अनुवाद
"ये गुण जीवों में भी, कभी-कभी अल्प मात्रा में, विद्यमान रहते हैं। तथापि, ये पूर्णतः भगवान में विद्यमान रहते हैं।"
 
"These qualities are present in living beings, sometimes in small quantities. However, they are present in full in the Lord."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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