श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 270
 
 
श्लोक  2.1.270 
यथा—
वदान्यः को भवेद् अत्र वदान्यः पुरुषोत्तमात् ।
अकिञ्चनाय येनात्मा निर्गुणायापि दीयते ॥२.१.२७०॥
 
 
अनुवाद
क्या परमेश्वर से अधिक कोई उदार है, जो अपनी आत्मा तक को दीन-हीन और अज्ञात को अर्पित कर देता है?
 
Is there anyone more generous than God, who offers even His soul to the lowly and unknown?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)