श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 266
 
 
श्लोक  2.1.266 
यथा —
आक्रुष्टे प्रकटं दिदण्डयिषुणा चण्डेन रङ्ग-स्थले
नन्दे चानकदुन्दुभौ च पुरतः कंसेन विश्व-द्रुहा ।
दृष्टिं तत्र सुरारि-मृत्यु-कुलटा-सम्पर्क-दूतीं क्षिपन्
मञ्चस्योपरि सञ्चुकुर्दिषुर् असौ पश्याच्युतः प्राञ्चति ॥२.१.२६६॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से द्वेष रखने वाला, क्रोधित कंस, नन्द और वसुदेव को दण्ड देने की इच्छा से जोर से बुलाता है, तब कृष्ण राक्षसों के लिए मृत्यु कहलाने वाली पतित स्त्री पर भेजे गए दूत के समान दृष्टि डालते हैं, और खेलने की इच्छा से रंगभूमि में चढ़ जाते हैं।"
 
Example: "When the enraged Kamsa, who hates the entire universe, calls out loudly to punish Nanda and Vasudeva, Krishna looks upon the fallen woman, who is death to the demons, like a messenger sent forth, and ascends the stage, desirous of playing."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd