श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 256
 
 
श्लोक  2.1.256 
यथा —
मल्ल-श्रेण्याम् अविनयवतीं मन्थरां न्यस्य दृष्टिं
व्याधुन्वानो द्विप इव भुवं विक्रमाडम्बरेण ।
वाग्-आरम्भे स्मित-परिमलैः क्षालयन् मञ्च-कक्षां
तुङ्गे रङ्ग-स्थल-परिसरे सारसाक्षः ससार ॥२.१.२५६॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "कमल-नेत्र कृष्ण, पहलवानों को स्थिर और निर्भीक दृष्टि से देखते हुए, हाथी के समान पृथ्वी को हिलाते हुए, विजय से गर्वित, हास्य की सुगंध से स्पर्शित उनके शब्द, मंच पर जल छिड़कते हुए, उठे हुए अखाड़े में प्रवेश कर गए।"
 
Example: "Lotus-eyed Krishna, looking at the wrestlers with a steady and fearless gaze, shaking the earth like an elephant, proud with victory, his words touched with the fragrance of humour, entered the raised arena, sprinkling water on the platform."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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