श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 246
 
 
श्लोक  2.1.246 
वैष्णव-तन्त्रे’पि —
अष्टादश-महा-दोषै रहिता भगवत्-तनुः ।
सर्वैश्वर्यमयी सत्य-विज्ञानानन्द-रूपिणी ॥२.१.२४६॥
 
 
अनुवाद
वैष्णव-तंत्र में भी इसकी पुष्टि की गई है: "भगवान का स्वरूप अठारह महान दोषों से रहित है, सभी शक्तियों से संपन्न है और अस्तित्व, ज्ञान और आनंद का सार है।"
 
This is also confirmed in the Vaishnava-Tantra: "The Lord's form is free from eighteen great defects, endowed with all powers and is the essence of existence, knowledge and bliss."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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