श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 230
 
 
श्लोक  2.1.230 
धीर-ललितः —
विदग्धो नव-तारुण्यः परिहास-विशारदः ।
निश्चिन्तो धीर-ललितः स्यात् प्रायः प्रेयसी-वशः ॥२.१.२३०॥
धीर-ललित: प्लय्fउल् —
 
 
अनुवाद
"उन्हें धीर-ललिता कहा जाता है, जो चतुर हैं, नवयौवन (कैशोर काल का अंत) से युक्त हैं, विनोद में कुशल हैं और चिंताओं से मुक्त हैं। वे अपने प्रिय भक्तों के वश में हैं।"
 
"She is called Dhira-Lalitha, intelligent, endowed with youth (late adolescence), skilled in playfulness and free from worries. She is under the control of her beloved devotees."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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