श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 215
 
 
श्लोक  2.1.215 
(६४) रूप-माधुर्यं, यथा तृतीये (३.२.१२) —
यन् मर्त्य-लीलौपयिकं स्व-योग-
माया-बलं दर्शयता गृहीतम् ।
विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः
परं पदं भूषण-भूषणाङ्गम् ॥२.१.२१५॥॥
 
 
अनुवाद
(64) रूप-माधुर्यं: उनके रूप की मधुरता। श्रीमद्भागवतम् के तृतीय स्कन्ध [3.2.12] से एक उदाहरण: "भगवान अपनी आंतरिक शक्ति, योग-माया द्वारा नश्वर जगत में प्रकट हुए। वे अपने शाश्वत रूप में प्रकट हुए, जो उनकी लीलाओं के लिए सर्वथा उपयुक्त है। यह रूप स्वयं भगवान के लिए भी, जो वैकुंठ के स्वामी हैं, अद्भुत है, क्योंकि वे सौंदर्य की सर्वोच्च पूर्णता हैं, जो सभी आभूषणों की शोभा को बढ़ाते हैं।"
 
(64) Rupa-madhuryam: The sweetness of His form. An example from the Third Canto [3.2.12] of the Srimad Bhagavatam: "The Lord appeared in the mortal world by His internal potency, Yoga-maya. He appeared in His eternal form, which is most suitable for His pastimes. This form is wonderful even for the Lord Himself, the Lord of Vaikuntha, for He is the supreme perfection of beauty, surpassing the splendor of all ornaments."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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