श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 205
 
 
श्लोक  2.1.205 
यथा —
पराभवं फेनिल-वक्त्रतां च
बन्धं च भीतिं च मृतिं च कृत्वा ।
पवर्ग-दातापि शिखण्ड-मौले
त्वं शात्रवाणाम् अपवर्गदो’सि ॥२.१.२०५॥
 
 
अनुवाद
हे परम रत्न! यद्यपि आप अपने शत्रुओं को पराजय (प), फेनयुक्त मुख (फ), बंधन (बा), भय (भ) और मृत्यु (मा) के पवर्ग देते हैं, तथापि आप उन्हें इसके विपरीत अपवर्ग या मोक्ष भी देते हैं।
 
O Supreme Jewel! Although You give Your enemies the pavarga (classification) of defeat (pa), foaming face (pha), bondage (ba), fear (bha) and death (ma), You also give them the opposite, apavarga or liberation.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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