श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 201
 
 
श्लोक  2.1.201 
यथा वा —
तत्त्वैर् ब्रह्माण्डम् आढ्यं सुरकुल-भुवनैश् चाङ्कितं योजनानां
पञ्चाशत्-कोट्य्-अखर्व-क्षिति-खचितम् इदं यच् च पाताल-पूर्णम् ।
तादृग्-ब्रह्माण्ड-लक्षायुत-परिचय-भाग् एक-कक्षं विधात्रा
दृष्टं यस्यात्र वृन्दावनम् अपि भवतः कः स्तुतौ तस्य शक्तः ॥२.१.२०१॥
 
 
अनुवाद
एक और उदाहरण: "आपकी महिमा कैसे संभव है, जिन्हें ब्रह्मा ने वृंदावन में देखा था? उस वृंदावन के एक कोने में लाखों ब्रह्मांड स्थित हैं, जिनमें से प्रत्येक 500,000,000 योजन व्यास वाली पृथ्वी से बना है, और प्रत्येक निचले नारकीय ग्रहों और ऊपरी स्वर्गीय ग्रहों और सभी भौतिक तत्वों से भरा हुआ है।"
 
Another example: "How is it possible to glorify You, Whom Brahma saw in Vrindavan? In one corner of that Vrindavan are situated millions of universes, each consisting of earths with a diameter of 500,000,000 yojanas, and each filled with the lower hellish planets and the upper heavenly planets and all the material elements."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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