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श्लोक 2.1.182  |
(५२) सर्वज्ञः —
पर-चित्त-स्थितं देश-कालाद्य्-अन्तरितं तथा ।
यो जानाति समस्तार्थः स सर्वज्ञो निगद्यते ॥२.१.१८२॥॥ |
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| अनुवाद |
| (52) सर्वज्ञ: सर्वज्ञ - "जो सभी वस्तुओं का साकार रूप है और सभी समय और स्थान में सभी हृदयों की स्थिति को जानता है, उसे सर्वज्ञ कहा जाता है।" |
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| (52) Omniscient: Omniscient - "He who is the embodiment of all things and knows the state of all hearts in all time and space is called Omniscient." |
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