श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 180
 
 
श्लोक  2.1.180 
(५१) अथ सदा-स्वरूप-सम्प्राप्तः —
सदा-स्वरूप-सम्प्राप्तो माया-कार्य-वशीकृतः ॥२.१.१८०॥॥
 
 
अनुवाद
(51) अथ सदा-स्वरूप-सम्प्रप्तः नित्य रूप - "जो माया या उसके प्रभावों से नियंत्रित नहीं है, उसे नित्य रूप वाला कहा जाता है।"
 
(51) Atha sada-svarupa-sampraptaḥ nitya rūpa - "He who is not controlled by Maya or its effects is said to have an eternal form."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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