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श्लोक 2.1.159  |
यथा —
त्वद्-यशः-कुमुद-बन्धु-कौमुदी
शुभ्र-भावम् अभितो नयन्त्य् अपि ।
नन्दनन्दन कथं नु निर्ममे
कृष्ण-भाव-कलिलं जगत्-त्रयम् ॥२.१.१५९॥ |
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| अनुवाद |
| हे नन्दपुत्र! चूँकि आपके सद्गुण रूपी चन्द्रमा के प्रकाश ने पहले ही सब कुछ उजला (श्वेत) कर दिया है, तो फिर यह जगत् को कृष्ण-प्रेम से कैसे भर सकता है? (कृष्ण का अर्थ अंधकार भी है) |
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| O son of Nanda, since the moonlight of your virtues has already illuminated everything, how can it fill the world with Krishna's love? (Krishna also means darkness) |
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