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श्लोक 2.1.157  |
यथा —
भवतः प्रताप-तपने भुवनं कृष्ण प्रतापयति ।
घोरासुर-घुकानां शरणम् अभूत् कन्दरा-तिमिरम् ॥२.१.१५७॥ |
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| अनुवाद |
| "जब आप अपने सूर्य के समान तेज से संसार को प्रकाशित करते हैं, तब पर्वत की गुफाओं का अंधकार उल्लुओं के समान भयंकर राक्षसों के लिए आश्रय बन जाता है।" |
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| "When you illuminate the world with your sun-like brilliance, the darkness of the mountain caves becomes a refuge for fierce demons like owls." |
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