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श्लोक 2.1.155  |
यथा —
कृताः कृतार्था मुनयो विनोदैः
खल-क्षयेणाखिल-धार्मिकाश् च ।
वपुर्-विमर्देन खलाश् च युद्धे
न कस्य पथ्यं हरिणा व्यधायि ॥२.१.१५५॥ |
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| अनुवाद |
| "उन्होंने द्वारका में अपने गुणों के प्रदर्शन द्वारा ऋषियों को लाभ पहुँचाया। उन्होंने दुष्टों का नाश करके धर्म के अनुयायियों को लाभ पहुँचाया। उन्होंने युद्ध में दुष्टों का वध करके उन्हें सफलता प्रदान की। कृष्ण ने किसे लाभ नहीं पहुँचाया?" |
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| "He benefited the sages by displaying His virtues in Dwaraka. He benefited the followers of Dharma by destroying the wicked. He brought success to the wicked by killing them in war. Whom did Krishna not benefit?" |
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