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श्लोक 2.1.148  |
(३९) भक्त-सुहृत् —
सुसेव्यो दास-बन्धुश् च द्विधा भक्त-सुहृन् मतः ॥२.१.१४८॥॥ |
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| अनुवाद |
| (39) भक्तसुहृत्: भक्तों के मित्र - "कृष्ण दो प्रकार से अपने भक्तों के मित्र हैं: सहज सेवा प्राप्त होना और अपने सेवक का मित्र होना।" |
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| (39) Bhaktasuhrit: Friend of devotees - "Krishna is a friend of His devotees in two ways: being easily served and being a friend of His servant." |
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