श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 134
 
 
श्लोक  2.1.134 
यथा वा —
स्खलन्-नयन-वारिभिर् विरचिताभिषेक-श्रिये
त्वराभर-तरङ्गतः कवलितात्म-विस्फूर्तये ।
निशान्त-शर-शायिना सुर-सरित्-सुतेन स्मृतेः
सपद्य-वश-वर्त्मणो भगवतः कृपायै नमः ॥२.१.१३४॥
 
 
अनुवाद
एक और उदाहरण: "मैं भगवान की करुणा को नमन करता हूँ, जो बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म द्वारा स्मरण किए जाने पर उनके नियंत्रण से परे तुरन्त प्रकट हो गए। वे भगवान के रूप में अपनी स्थिति को भूलकर भीष्म की ओर दौड़े, उनका शरीर आँसुओं की वर्षा से नहा गया।"
 
Another example: "I bow to the compassion of the Lord, who, when remembered by Bhishma lying on the bed of arrows, instantly manifested beyond his control. Forgetting his status as a Lord, he rushed towards Bhishma, his body bathed in a shower of tears."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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