श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  2.1.105 
(२२) वशी —
वशी जितेन्द्रियः प्रोक्तः ॥२.१.१०५॥॥
 
 
अनुवाद
(22) वशी: वशीकरणकर्ता - "वशीकरणकर्ता वह है जो अपनी इन्द्रियों को वश में रखता है।"
 
(22) Vashi: The one who controls the senses.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)