श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 4: प्रेम-भक्ति (भगवान के प्रेम में भक्ति)  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.4.10 
यथ एकादशे (११.१२.७) —
ते नाधीत-श्रुति-गणा नोपासित-महत्तमाः ।
अव्रतातप्त-तपसः मत्-सङ्गान् माम् उपागताः ॥१.४.१०॥
 
 
अनुवाद
भगवान की महान कृपा से उत्पन्न प्रेम की व्याख्या श्रीमद्भागवतम् के ग्यारहवें स्कंध [11.12.7] में इस प्रकार की गई है: "जिन व्यक्तियों का मैंने उल्लेख किया है, उन्होंने न तो वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन किया, न ही उन्होंने महान संतों की पूजा की, न ही उन्होंने कठोर व्रत या तपस्या की। केवल मेरी और मेरे भक्तों की संगति से ही उन्होंने मुझे प्राप्त किया।"
 
The love that arises from the great grace of the Lord is explained in the Eleventh Canto of the Srimad Bhagavatam [11.12.7] as follows: "The persons I have mentioned neither studied the Vedic literature deeply, nor did they worship the great sages, nor did they perform severe vows or austerities. It was only by association with Me and My devotees that they attained Me."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)