श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 3: भाव-भक्ति (उत्कट समाधि में भक्ति)  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  1.3.58 
लोकोत्तर-चमत्कार-कारकः सर्व-शक्तिदः ।
यः प्रथीयान् भवेद् भावः स तु कृष्ण-प्रसादजः ॥१.३.५८॥
 
 
अनुवाद
“वह भाव जो इस संसार की किसी भी वस्तु से अधिक अद्भुत है, जो सभी शक्तियां प्रदान करता है और जो बहुत गहन है, वह कृष्ण की कृपा से उत्पन्न होता है।”
 
“That feeling which is more wonderful than anything in this world, which gives all powers and which is very profound, arises by the grace of Krishna.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)