श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 3: भाव-भक्ति (उत्कट समाधि में भक्ति)  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  1.3.57 
साधनेक्षां विना यस्मिन्न् अकस्माद् भाव ईक्ष्यते ।
विघ्न-स्थगितम् अत्रोह्यं प्राग्-भवीयं सुसाधनं ॥१.३.५७॥
 
 
अनुवाद
"कभी-कभी साधना या दया के ज्ञान से रहित, और शास्त्र-ज्ञान से रहित व्यक्ति में भाव अचानक प्रकट हो जाता है। इससे यह अनुमान लगाना चाहिए कि पिछले जन्म में किसी बाधा ने उस व्यक्ति की कुशल साधना में बाधा डाली थी, और इस जन्म में वह बाधा अंततः दूर हो गई है।"
 
"Sometimes, a feeling suddenly appears in a person devoid of knowledge of spiritual practice or compassion, and devoid of scriptural knowledge. From this, it should be inferred that some obstacle in a previous life hindered that person's skillful spiritual practice, and in this life that obstacle has finally been removed."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)