श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 3: भाव-भक्ति (उत्कट समाधि में भक्ति)  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  1.3.39 
तद्-गुणाख्याने आसाक्तिः, यथा कृष्ण-कर्णामृते (८८) —
माधुर्याद् अपि मधुरं मन्मथता तस्य किम् अपि कैशोरम् ।
चपल्याद् अपि चपलं चेतो बत हरति हन्त किं कुर्मः ॥१.३.३९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान के गुणों की चर्चा करने में आसक्ति का वर्णन कृष्ण-कर्णामृत [88] में किया गया है: "कामदेव के गुणों वाले, अत्यंत मधुर और अत्यंत चंचल, उन युवा कृष्ण ने मेरा हृदय चुरा लिया है। मुझे क्या करना चाहिए?"
 
The attachment to discussing the qualities of the Lord is described in the Krishna-karnamrita [88]: "That young Krishna, possessing the qualities of Cupid, extremely sweet and extremely playful, has stolen my heart. What should I do?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)