श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 3: भाव-भक्ति (उत्कट समाधि में भक्ति)  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.3.17 
तत्र वाचिक-प्रसादजः, यथा नारदीये —
सर्व-मण्गल-मूर्धन्या पूर्णानन्द-मयी सदा ।
द्विजेन्द्र तव मय्य् अस्तु भक्तिर् अव्याभिचारिणी ॥१.३.१७॥
 
 
अनुवाद
नारदीय पुराण में मौखिक दया का वर्णन इस प्रकार है: "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मुझमें आपकी अनन्य भक्ति हो। वह भक्ति समस्त मंगलों का शिखर है और शाश्वत आनंद से परिपूर्ण है।"
 
The Naradiya Purana describes verbal mercy as follows: "O best of Brahmins, have exclusive devotion for me. That devotion is the pinnacle of all auspiciousness and is full of eternal bliss."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)