श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 3: भाव-भक्ति (उत्कट समाधि में भक्ति)  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.3.13 
पुराणे नात्य-शास्त्रे च द्वयोस् तु रति-भावयोः ।
समानार्थतया ह्य् अत्र द्वयम् ऐक्येन लक्षितम् ॥१.३.१३ ॥
 
 
अनुवाद
"पुराणों और नाट्यशास्त्र में रति और भाव का एक ही अर्थ है। अतः इस कृति में भी उनका वही अर्थ होगा।"
 
"In the Puranas and Natyashastra, Rati and Bhaav have the same meaning. Therefore, they will have the same meaning in this work also."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)