श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  1.2.42 
तथा (११.१४.१४) —
न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्र-धिष्ण्यं
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् ।
न योग-सिद्धीर् अपुनर्-भवं वा
मय्य् अर्पितात्मेच्छति मद् विनान्यत् ॥१.२.४२॥॥
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवतम् के ग्यारहवें स्कंध [11.14.14] में भी भगवान कहते हैं: "जिसने अपनी चेतना मुझमें स्थिर कर ली है, वह न तो ब्रह्मा या इंद्र का पद या धाम चाहता है, न पृथ्वी पर साम्राज्य, न निम्न लोकों में प्रभुता, न अष्टांग योगसिद्धि, न ही जन्म-मृत्यु से मुक्ति। ऐसा व्यक्ति केवल मुझे ही चाहता है।"
 
In the Eleventh Canto of Srimad Bhagavatam [11.14.14] the Lord also says: "He who has fixed his consciousness on Me, desires neither the position or abode of Brahma or Indra, nor kingdom on earth, nor lordship in the lower planets, nor the eightfold yogic perfection, nor liberation from birth and death. Such a person desires Me alone."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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