श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.2.33 
तत्रैव श्री-रुद्रोक्तौ (६.१७.२८) —
नारायण-पराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति ।
स्वर्गापवर्ग-नरकेष्व् अपि तुल्यार्थ-दर्शिनः ॥१.२.३३॥
 
 
अनुवाद
भगवान शिव भी श्रीमद्भागवतम् [6.17.28] में इस विषय पर बोलते हैं: "जो भक्त केवल भगवान नारायण की भक्ति में लीन रहते हैं, उन्हें जीवन की किसी भी स्थिति का भय नहीं होता। उनके लिए स्वर्ग, मोक्ष और नरक सभी समान हैं, क्योंकि ऐसे भक्त केवल भगवान की सेवा में ही रुचि रखते हैं।"
 
Lord Shiva also speaks on this subject in Srimad Bhagavatam [6.17.28]: "Those devotees who are absorbed solely in the devotional service of Lord Narayana have no fear of any condition of life. For them heaven, salvation and hell are all the same, because such devotees are interested only in the service of the Lord."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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