श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 294
 
 
श्लोक  1.2.294 
कृष्णं स्मरन् जनं चास्य प्रेष्ठं निज-समीहितम् ।
तत्-तत्-कथा-रतश् चासौ कुर्याद् वासं व्रजे सदा ॥१.२.२९४ ॥
 
 
अनुवाद
“कृष्ण के वृन्दावन रूप तथा अपने समान सेवाभाव रखने वाले उनके प्रिय पार्षदों का स्मरण करते हुए, उनसे संबंधित विषयों को सुनने में तल्लीन होकर, मनुष्य को सदैव व्रज में रहना चाहिए।”
 
“One should always stay in Vraja, remembering Krishna's Vrindavan form and his beloved associates who have the same spirit of service as him, and being absorbed in listening to matters related to them.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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