श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 283
 
 
श्लोक  1.2.283 
तत्र कामरूपा —
सा कामरूपा सम्भोग-तृष्णां या नयति स्वताम् ।
यद् अस्यां कृष्ण-सौख्यार्थम् एव केवलम् उद्यमः ॥१.२.२८३ ॥
 
 
अनुवाद
कामरूप-रागात्मिका-भक्ति की परिभाषा इस प्रकार है: "प्रियतम में पूर्ण तल्लीनता वाली वह भक्ति जो भगवान के साथ दाम्पत्य संबंध की आंतरिक प्यास उत्पन्न करती है, कामरूप-भक्ति कहलाती है। इसे भक्ति इसलिए कहा जाता है क्योंकि उस अवस्था में केवल कृष्ण को प्रसन्न करने की ही उत्कंठा होती है।"
 
The definition of Kamarupa-ragātmika-bhakti is as follows: "That devotion consisting of complete absorption in the beloved which generates an inner thirst for conjugal union with the Lord is called Kamarupa-bhakti. It is called devotion because in that state the only desire is to please Krishna."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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