श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.2.25 
श्री कृष्ण-चरणाम्भोज-सेवा-निर्वृत-चेतसाम् ।
एषां मोक्षाय भक्तानां न कदाचित् स्पृहा भवेत् ॥१.२.२५॥
 
 
अनुवाद
“जो भक्त कृष्ण के चरणकमलों की सेवा के आनंद में लीन हैं, उन्हें कभी मुक्ति की इच्छा नहीं करनी चाहिए।”
 
“The devotees who are absorbed in the bliss of serving the lotus feet of Krishna should never desire liberation.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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