श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 246
 
 
श्लोक  1.2.246 
संमतं भक्ति-विज्ञानां भक्त्य्-अङ्गत्वं न कर्मणाम् ॥१.२.२४६॥
 
 
अनुवाद
“भक्ति के जानकारों की आम सहमति यह है कि कर्म (वर्णाश्रम कर्तव्य) भक्ति का अंग नहीं है।”
 
“The general consensus among those who understand bhakti is that karma (varnashrama duties) is not a part of bhakti.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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