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श्लोक 1.2.22  |
भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते ।
तावद् भक्ति-सुखस्यात्र कथम् अभ्युदयो भवेत् ॥१.२.२२॥ |
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| अनुवाद |
| “जब भोग और मोक्ष की इच्छा रूपी डायन हृदय में विद्यमान हो, तो भक्ति का सुख कैसे उत्पन्न हो सकता है?” |
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| “When the witch of desire for enjoyment and salvation is present in the heart, how can the happiness of devotion arise?” |
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