श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.2.22 
भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते ।
तावद् भक्ति-सुखस्यात्र कथम् अभ्युदयो भवेत् ॥१.२.२२॥
 
 
अनुवाद
“जब भोग और मोक्ष की इच्छा रूपी डायन हृदय में विद्यमान हो, तो भक्ति का सुख कैसे उत्पन्न हो सकता है?”
 
“When the witch of desire for enjoyment and salvation is present in the heart, how can the happiness of devotion arise?”
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd