श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  1.2.217 
प्रथमे (१.१९.३३) च—
येषां संस्मरणात् पुंसां सद्यः शुद्ध्यन्ति वै गृहाः ।
किं पुनर् दर्शन-स्पर्श-पाद-शौचासनादिभिः ॥१.२.२१७॥॥
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवतम् के प्रथम स्कन्ध [1.19.33] में कहा गया है: "आपको स्मरण करने मात्र से ही हमारे घर तुरन्त पवित्र हो जाते हैं। फिर आपके दर्शन, स्पर्श, आपके पवित्र चरण-प्रक्षालन और आपको अपने घर में स्थान देने की तो बात ही क्या?"
 
In the first canto [1.19.33] of the Srimad Bhagavatam it is said: "By merely remembering You our homes are instantly purified. Then what to say of Your sight, Your touch, washing Your holy feet and giving You a place in our homes?"
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd