श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 210
 
 
श्लोक  1.2.210 
तथा श्री-भागवते द्वादशे (१२.१३.१५) च—
सर्व-वेदान्त-सारं हि श्री-भागवतम् इष्यते ।
तद्-रसामृत-तृप्तस्य नान्यत्र स्याद् रतिः क्वचित् ॥१.२.२१०॥
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवतम् के बारहवें स्कंध [12.13.15] में भी इसका उदाहरण दिया गया है: "श्रीमद्भागवतम् को समस्त वेदान्त दर्शन का सार कहा गया है। जिसने इसके अमृतमय रस से तृप्ति प्राप्त कर ली है, वह कभी किसी अन्य साहित्य की ओर आकर्षित नहीं होगा।"
 
This is also illustrated in the Twelfth Canto of the Srimad Bhagavatam [12.13.15]: "The Srimad Bhagavatam is said to be the essence of all Vedanta philosophy. One who has attained satisfaction from its nectar-like essence will never be attracted to any other literature."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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