श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 186
 
 
श्लोक  1.2.186 
मृदु-श्रद्धस्य कथिता स्वल्पा कर्माधिकारिता ।
तद्-अर्पितं हरौ दास्यम् इति कैश्चिद् उदीर्यते ॥१.२.१८६॥
 
 
अनुवाद
"कुछ लोग कहते हैं कि भक्ति में दुर्बल विश्वास और निर्धारित कर्तव्यों के लिए अल्प योग्यता वाले व्यक्ति द्वारा कर्तव्यों का यह समर्पण दास्य कहलाता है।"
 
"Some say that this surrender of duties by a person with weak faith in devotion and little aptitude for the prescribed duties is called dasya."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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