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श्लोक 1.2.164  |
अगस्त्य-संहितायां च —
आघ्राणं गन्ध-पुष्पादेर् अर्चितस्य तपोधन ।
विशुद्धिः स्याद् अनन्तस्य घ्राणस्येहाभिधीयते ॥१.२.१६४ ॥ |
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| अनुवाद |
| अगस्त्य-संहिता से: "ऐसा कहा जाता है कि अनंत भगवान को अर्पित किए गए फूलों और गंध को सूंघने से इस संसार में पूर्ण शुद्धि होती है।" |
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| From the Agastya-Samhita: "It is said that smelling the flowers and scents offered to the infinite Lord brings complete purification in this world." |
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