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श्लोक 1.2.162  |
३९ - अथ धूप-सौरभ्यम्, यथा हरि-भक्ति-सुधोदये —
आघ्राणं यद् धरेर् दत्त-धूपोच्छिष्टस्य सर्वतः ।
तद्-भव-व्याल-दष्टानां नस्यं कर्म विषापहम् ॥१.२.१६२ ॥ |
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| अनुवाद |
| हरि-भक्ति-शुद्धोदय से भगवान को अर्पित धूप को सूंघना: "नाक की क्रिया - भगवान को अर्पित धूप को सूंघना - भौतिक अस्तित्व के साँप द्वारा काटे गए लोगों पर लगाए गए कर्म के जहर को पूरी तरह से नष्ट कर देती है।" |
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| Smelling the Incense Offered to the Lord from Hari-bhakti-shuddhodaya: "The action of the nose—smelling the incense offered to the Lord—completely destroys the poison of karma imposed on those bitten by the snake of material existence." |
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