श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.2.15 
यथैकादशे (११.२०.२८) —
यदृच्छया मत्-कथादौ जात-श्रद्धो’स्तु यः पुमान् ।
न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्ति-योगो’स्य सिद्धिदः ॥१.२.१५॥
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध [11.20.8] में कहा गया है: “यदि किसी प्रकार सौभाग्य से कोई मेरी महिमा के श्रवण और कीर्तन में श्रद्धा विकसित कर लेता है, तो ऐसा व्यक्ति, भौतिक जीवन से न तो बहुत विरक्त होता है और न ही उसमें आसक्त होता है, तथा मेरे प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति के मार्ग से सिद्धि प्राप्त करता है।”
 
In the Eleventh Canto of the Srimad Bhagavatam [11.20.8] it is said: “If by any good fortune one develops faith in hearing and chanting My glories, such a person becomes neither too detached from nor attached to material life, and attains perfection through the path of loving devotion to Me.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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