श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  1.2.143 
अङ्गानि विविधान्य् एव स्युः पूजा-परिचर्ययोः ।
न तानि लिखितान्य् अत्र ग्रन्थ-बाहुल्य-भीतितः ॥१.२.१४३ ॥
 
 
अनुवाद
"देवपूजा और परिचार्य के विभिन्न अंग हैं। पुस्तक बहुत लंबी हो जाने के भय से इनका वर्णन यहाँ नहीं किया गया है।"
 
"There are various aspects of worship and service to the deity. These have not been described here for fear of making the book too long."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)