भवन्तम एवानुचरण निरन्तरः
प्रशान्त-निःशेष-मनोरथान्तरः
कदाऽहम् ऐकान्तिक-नित्य-किङ्करः
प्रहर्षयिष्यामि सनाथ-जीवितम्
"आपकी निरंतर सेवा करने से व्यक्ति सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है और पूरी तरह से शांत हो जाता है। मैं कब आपका स्थायी शाश्वत सेवक बनूंगा और ऐसे योग्य स्वामी को पाकर सदैव खुशी महसूस करूंगा?"
मनोरथेनसति धावतो बहि: जो मानसिक मंच पर कार्य करता है, उसे भौतिक गतिविधियों में उतरना होगा। हालाँकि, भगवान श्रीहरी और उनके शुद्ध भक्त में भौतिक दूषण पूरी तरह से अनुपस्थित है। इसलिए भगवान को प्रशांत, पूरी तरह से शांत, भौतिक अस्तित्व की अशांति से मुक्त बताया जाता है। सर्वोच्च भगवान का कोई भौतिक नाम या रूप नहीं है; केवल मूर्ख ही सोचते हैं कि भगवान का नाम और रूप भौतिक है (अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्)। सर्वोच्च भगवान की पहचान यह है कि वह मूल व्यक्ति हैं। फिर भी, जिनके पास ज्ञान का ख़ज़ाना कम है वे सोचते हैं कि भगवान निराकार हैं। भगवान भौतिक अर्थों में निराकार हैं, लेकिन उनका उनका दिव्य रूप है (सच्चिदानंद-विग्रह)।
