श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 8: भगवान् कपिलदेव से सगर-पुत्रों की भेंट  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  9.8.24 
प्रशान्त मायागुणकर्मलिङ्ग-
मनामरूपं सदसद्विमुक्तम् ।
ज्ञानोपदेशाय गृहीतदेहं
नमामहे त्वां पुरुषं पुराणम् ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
हे पूर्णतः शांत स्वामी, यद्यपि भौतिक प्रकृति, सकाम कर्म और उनके परिणामी भौतिक नाम और रूप आपकी सृष्टि हैं, पर आप उनसे अप्रभावित रहते हैं। इसलिए आपका दिव्य नाम भौतिक नामों से भिन्न है और आपका स्वरूप भौतिक स्वरूपों से भिन्न है। आप हमें निर्देश देने के लिए भगवद-गीता के समान ही भौतिक शरीर के समान रूप धारण करते हैं, लेकिन वास्तव में आप ही परम आदि पुरुष हैं। इसलिए मैं आपको आदरपूर्वक प्रणाम करता हूँ।
 
O most peaceful Lord, although this nature, all fruitive activities and their resulting material names and forms are Your creation, You remain unaffected by them. Therefore Your transcendental name is different from the material names and Your form is different from the material forms. You assume a form similar to the physical body only to impart knowledge like the Bhagavad-gita to us, but in reality You remain the Supreme Original Person. Therefore I offer my respectful obeisances unto You.
तात्पर्य
श्रील यामुनाचार्य ने अपने स्तोत्र-रत्न (43) में इस श्लोक को उद्धृत किया है:

भवन्तम एवानुचरण निरन्तरः

प्रशान्त-निःशेष-मनोरथान्तरः

कदाऽहम् ऐकान्तिक-नित्य-किङ्करः

प्रहर्षयिष्यामि सनाथ-जीवितम्

"आपकी निरंतर सेवा करने से व्यक्ति सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है और पूरी तरह से शांत हो जाता है। मैं कब आपका स्थायी शाश्वत सेवक बनूंगा और ऐसे योग्य स्वामी को पाकर सदैव खुशी महसूस करूंगा?"

मनोरथेनसति धावतो बहि: जो मानसिक मंच पर कार्य करता है, उसे भौतिक गतिविधियों में उतरना होगा। हालाँकि, भगवान श्रीहरी और उनके शुद्ध भक्त में भौतिक दूषण पूरी तरह से अनुपस्थित है। इसलिए भगवान को प्रशांत, पूरी तरह से शांत, भौतिक अस्तित्व की अशांति से मुक्त बताया जाता है। सर्वोच्च भगवान का कोई भौतिक नाम या रूप नहीं है; केवल मूर्ख ही सोचते हैं कि भगवान का नाम और रूप भौतिक है (अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्)। सर्वोच्च भगवान की पहचान यह है कि वह मूल व्यक्ति हैं। फिर भी, जिनके पास ज्ञान का ख़ज़ाना कम है वे सोचते हैं कि भगवान निराकार हैं। भगवान भौतिक अर्थों में निराकार हैं, लेकिन उनका उनका दिव्य रूप है (सच्चिदानंद-विग्रह)।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)