तेषाम एवं अनुकम्पार्थमहं अज्ञानजं तमः नाशायम्य आत्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता
"उनके लिए करुणा से बाहर, मैं, उनके हृदय में निवास करता हुआ, अज्ञानता से पैदा हुए अंधकार को ज्ञान के चमकते दीप से नष्ट कर देता हूँ।" भक्त कुछ भी ऐसा नहीं करते हैं जिसे भगवान द्वारा मंज़ूरी नहीं दी गई हो। जैसा कि कहा गया है, वैष्णवरा क्रिया मुद्रा विज्ञेह ना बुजय। सबसे विद्वान या अनुभवी व्यक्ति भी वैष्णव, शुद्ध भक्त की गतिविधियों को नहीं समझ सकता। इसलिए, किसी को भी शुद्ध वैष्णव की आलोचना नहीं करनी चाहिए। एक वैष्णव अपना काम जानता है; वह जो कुछ भी करता है, वह बिल्कुल सही है क्योंकि उसे हमेशा भगवान द्वारा निर्देशित किया जाता है।
