श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  9.4.68 
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् ।
मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि ॥ ६८ ॥
 
 
अनुवाद
पवित्र भक्त सदैव मेरे हृदय के मूल में निवास करता है और मैं सदैव पवित्र भक्त के हृदय में वास करता हूँ। मेरे भक्त मेरे अलावा कुछ नहीं जानते और मैं उनके अलावा किसी और को नहीं जानता।
 
A pure devotee always resides in my heart and I always reside in the heart of a pure devotee. My devotees know nothing but me and I know no one except them.
तात्पर्य
चूँकि दुर्वासा मुनि महाराज अम्बरिश को दंड देना चाहते थे, तो यह समझना होगा कि वे भगवान के हृदय को कष्ट देना चाहते थे, क्योंकि भगवान कहते हैं, साधवो हृदयं मायम: "निर्दोष भक्त हमेशा मेरे हृदय के केंद्र में रहते हैं।" भगवान की भावनाएँ माता-पिता की तरह हैं, जिनको तब तकलीफ होती है जब उनके बच्चे को तकलीफ होती है। इसलिए, भक्त के चरणकमलों का अपमान करना एक गंभीर बात है। चैतन्य महाप्रभु ने दृढ़तापूर्वक सिफ़ारिश की है कि कोई व्यक्ति भक्त के चरणकमलों का अपमान न करे। इस तरह के अपराधों की तुलना एक पागल हाथी से की जाती है क्योंकि जब एक पागल हाथी किसी बगीचे में घुसता है तो वह तबाही मचाता है। इसलिए, व्यक्ति को यह बहुत सावधानी रखनी चाहिए कि वह शुद्ध भक्त के चरणकमलों का अपमान न करे। वास्तव में, महाराज अम्बरिश बिल्कुल भी दोषी नहीं थे; दुर्वासा मुनि उन्हें बिना बात के ही तुच्छ कारणों से दंड देना चाहते थे। महाराज अम्बरिश भगवान को प्रसन्न करने के लिए भक्ति सेवा के हिस्से के रूप में एकादशी-पारण को पूरा करना चाहते थे, और इसलिए उन्होंने थोड़ा पानी पिया। लेकिन हालाँकि दुर्वासा मुनि एक महान रहस्यवादी ब्राह्मण थे, वह नहीं जानते थे कि क्या है। यही एक शुद्ध भक्त और वैदिक ज्ञान के तथाकथित विद्वान विद्वान के बीच का अंतर है। भक्त, हमेशा भगवान के हृदय के केंद्र में स्थित रहते हैं, निश्चित रूप से भगवान से सीधे सभी निर्देश प्राप्त करते हैं, जैसा कि स्वयं भगवान ने भागवद गीता (10.11) में पुष्टि की है:

तेषाम एवं अनुकम्पार्थमहं अज्ञानजं तमः नाशायम्य आत्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता

"उनके लिए करुणा से बाहर, मैं, उनके हृदय में निवास करता हुआ, अज्ञानता से पैदा हुए अंधकार को ज्ञान के चमकते दीप से नष्ट कर देता हूँ।" भक्त कुछ भी ऐसा नहीं करते हैं जिसे भगवान द्वारा मंज़ूरी नहीं दी गई हो। जैसा कि कहा गया है, वैष्णवरा क्रिया मुद्रा विज्ञेह ना बुजय। सबसे विद्वान या अनुभवी व्यक्ति भी वैष्णव, शुद्ध भक्त की गतिविधियों को नहीं समझ सकता। इसलिए, किसी को भी शुद्ध वैष्णव की आलोचना नहीं करनी चाहिए। एक वैष्णव अपना काम जानता है; वह जो कुछ भी करता है, वह बिल्कुल सही है क्योंकि उसे हमेशा भगवान द्वारा निर्देशित किया जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)