ओह! जरा इस निर्दयी प्राणी का व्यवहार तो देखो, यह भगवान विष्णु का भक्त नहीं है। अपनी संपत्ति और पद के घमंड में यह अपने आप को भगवान समझ बैठा है। देखो, इसने धर्म के नियमों का उल्लंघन कैसे कर डाला है।
Oh! Just look at the behavior of this cruel person, he is not a devotee of Lord Vishnu. Due to the pride of his wealth and position, he is considering himself as God. Look, he has violated the rules of religion.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने दुर्वास मुनि द्वारा बोले गए इस श्लोक के संपूर्ण अर्थ को मोड़ दिया है। दुर्वास मुनि ने यह संकेतित करने के लिए 'नृ-शंसस्य' शब्द का प्रयोग किया था कि राजा क्रूर था पर विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इसका अर्थ इस प्रकार से व्याख्यायित करते हैं कि राजा के चरित्र की स्थानीय लोगों द्वारा प्रशंसा की जाती थी। वे कहते हैं कि 'नृ' का अर्थ है "स्थानीय लोगों द्वारा" और 'शंसस्य' का अर्थ है "उस (अम्बरिश) का जिसके चरित्र की प्रशंसा की गई।" इसी प्रकार जो बहुत अमीर होता है वह अपने धन के कारण पागल हो जाता है और इसलिए उसको श्रिय-उन्मतस्य कहा जाता है, पर श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इन शब्दों की व्याख्या इस प्रकार की है कि यद्यपि महाराजा अम्बरिश बहुत धनवान राजा थे पर वे धन के पीछे पागल नहीं थे क्योंकि वे पहले ही भौतिक ऐश्वर्य के पागलपन से परे हो चुके थे। इसी प्रकार 'ईश-मानिनः' शब्द की व्याख्या यह मानकर की गई है कि वे भगवान श्री कृष्ण के प्रति इतने आदरपूर्ण थे कि उन्होंने दुर्वास मुनि के विचारों के बावजूद एकादशी-पारणा के पालन के नियमों का उल्लंघन नहीं किया क्योंकि उन्होंने सिर्फ जल ही ग्रहण किया था। इस तरह से श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने अम्बरिश महाराज और उनकी सभी गतिविधियों का समर्थन किया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥