स इत्थं भक्तियोगेन तपोयुक्तेन पार्थिव: ।
स्वधर्मेण हरिं प्रीणन् सर्वान् कामान्शनैर्जहौ ॥ २६ ॥
अनुवाद
इस प्रकार, इस लोक के राजा महाराज अम्बरीष ने भगवान की भक्ति की और इस प्रयास में उन्होंने कठोर तपस्या की। अपने कर्तव्य कर्मों द्वारा भगवान को सदैव प्रसन्न करते हुए उन्होंने धीरे-धीरे सारी भौतिक इच्छाओं का त्याग कर दिया।
Thus Maharaja Ambarisa, the king of this world, devoted himself to the Lord and in this endeavour he performed severe austerities. He gradually renounced all material desires, always pleasing the Lord by his lawful activities.
तात्पर्य
भक्ति-अनुष्ठान में अत्यंत कष्टप्रद तपस्याओं की अनेक किस्में हैं। उदाहरण के लिए, मंदिर में देव की पूजा में निश्चित रूप से श्रमसाध्य गतिविधियाँ होती हैं। श्री-विग्रहारादन-नित्य-नाना-श्रृंगार-तन्-मंदिर-मार्जनादौ। देव को सजाना, मंदिर को साफ करना, गंगा और यमुना से पानी लाना, नियमित कार्य करना, कई बार आरती करना, देव के लिए प्रथम श्रेणी का भोजन बनाना, वस्त्र तैयार करना आदि। इस तरह, व्यक्ति को लगातार विभिन्न गतिविधियों में व्यस्त रहना चाहिए, और इसमें शामिल कठिन श्रम निश्चित रूप से एक तपस्या है। इसी तरह, प्रचार में शामिल कठिन श्रम, साहित्य तैयार करना, नास्तिक लोगों को उपदेश देना और घर-घर जाकर साहित्य बांटना निश्चित रूप से एक तपस्या (तपो-युक्तेन) है। तपो दिव्यं पुत्रका। ऐसी तपस्या आवश्यक है। येन सत्त्वं शुद्ध्येत। भक्ति-सेवा में ऐसी तपस्या से, व्यक्ति भौतिक अस्तित्व के विचारों से शुद्ध होता है (कामान शनैर जहौ)। वास्तव में, ऐसी तपस्या व्यक्ति को भक्ति-सेवा की संवैधानिक स्थिति की ओर ले जाती है। इस तरह व्यक्ति भौतिक इच्छाओं को त्याग सकता है, और जैसे ही व्यक्ति भौतिक इच्छाओं से मुक्त होता है, वह जन्म और मृत्यु, वृद्धावस्था और बीमारी के पुनरावृत्ति से मुक्त हो जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥