ईजेऽश्वमेधैरधियज्ञमीश्वरं
महाविभूत्योपचिताङ्गदक्षिणै: ।
ततैर्वसिष्ठासितगौतमादिभि-
र्धन्वन्यभिस्रोतमसौ सरस्वतीम् ॥ २२ ॥
अनुवाद
उजड़े हुए मरुस्थलों में सरस्वती नदी के किनारे महाराज अम्बरीष ने अश्वमेध यज्ञ जैसे महान यज्ञों का सम्पादन करके सभी यज्ञों के स्वामी भगवान को प्रसन्न किया। ऐसे यज्ञों का सम्पादन महान ऐश्वर्य के साथ और उपयुक्त सामग्री के द्वारा करना पड़ता था, साथ ही ब्राह्मणों को दक्षिणा भी देनी पड़ती थी। इन सभी यज्ञों के निरीक्षण वसिष्ठ, असित और गौतम जैसे महान पुरूष करते थे जो यज्ञ कराने वाले राजा के प्रतिनिधि होते थे।
Maharaja Ambarisha performed great sacrifices like the Ashwamedha sacrifice in the desert through which the river Sarasvati flows and pleased the Lord, the master of all sacrifices. Such sacrifices were performed with great opulence and suitable materials and by giving dakshina to the brahmanas and these sacrifices were supervised by great men like Vasishtha, Asita and Gautama, who were the representatives of the king who performed the sacrifices.
तात्पर्य
जब वैदिक विधि के अनुसार यज्ञ किये जाते हैं, तब यज्ञिक ब्राह्मणों की, जो कि विद्वान ब्राह्मण होते हैं, आवश्यकता होती है। परन्तु कलियुग में ऐसे ब्राह्मणों की कमी है। अतः कलियुग में शास्त्रों द्वारा अनुशंसित यज्ञ कीर्तिन-यज्ञ है। (यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैर्यजन्ति हिसुमेधसः) । कलियुग में यज्ञिक ब्राह्मणों की कमी के कारण यज्ञ करना सम्भव नहीं है, इसलिए जो बुद्धिमान है, वह यज्ञ पर व्यर्थ खर्च करने की जगह पर संकीर्तिन यज्ञ करता है। भगवान को प्रसन्न करने के लिए यदि विधिवत रूप से यज्ञ न हों, तो वर्षा नहीं होती (यज्ञाद्भवति पर्जन्यः)। इस लिए यज्ञ करना आवश्यक है। यज्ञ के बिना वर्षा नहीं होती और वर्षा के अभाव में अनाज उत्पन्न नहीं होता और अकाल पड़ता है। इसलिए, अनाज उत्पन्न करने के लिए राजा का कर्तव्य है कि वह अश्वमेघ यज्ञ जैसे यज्ञ कराए। अन्नाद्भवन्ति भूतानि। अनाज के बिना मनुष्य और पशु भूखों मर जाते हैं। इसलिए, राज्य के लिए यज्ञ करना आवश्यक है, क्यूंकि यज्ञ से ही प्रजा का भरपेट पेट भरता है। उनकी विद्वत्तापूर्ण सेवाओं के लिए ब्राह्मणों और यज्ञिक पुरोहितों को यथेष्ट दक्षिणा दी जानी चाहिए। अम्बरिश महाराज, राज्य के प्रमुख के रूप में, वशिष्ठ, गौतम और असित जैसे महान् व्यक्तियों के द्वारा सभी यज्ञ कराते थे। परन्तु, जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है (सवैमनःकृष्ण-पदारविन्दयोः), व्यक्तिगत रूप से वह भक्ति सेवा में तत्पर थे। राजा या राज्य का प्रमुख यह देखना चाहिए कि सब कुछ उचित दिशा-निर्देशों में ठीक से चल रहा है, और उसे महाराज अम्बरिश का अनुकरण करते हुए, आदर्श भक्त होना चाहिए। राजा का यह कर्तव्य है कि वह यह देखे कि रेगिस्तानी भागों में भी अनाज उत्पन्न हो, अन्य स्थानों की तो बात ही अलग है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥